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Monday, May 14, 2012

खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के खतरे

शरद यादव
जनसत्ता, 30 नवंबर, 2011: खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत का निर्णय केंद्र सरकार ने ऐसे समय किया जिस समय वह मूल्यवृद्धि और काले धन पर संसद में घिरी हुई थी।
इसके साथ ही उसने विपक्ष के साथ टकराव का एक और मोर्चा खोल दिया है। उसके इस निर्णय की दो व्याख्याएं हो सकती हैं। पहली यह है कि केंद्र सरकार चाहती ही नहीं कि संसद सही तरीके से चले और वह टकराव के लिए विपक्ष को उकसाने की नीति अपना रही है। दूसरी वजह पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से हुई मुलाकात हो सकती है, जिसमें भारत की ओर से परमाणु सुरक्षा दायित्व कानून पर किसी तरह की राहत न दे पाने में प्रधानमंत्री ने ओबामा से अपनी असमर्थता जताई होगी। केंद्र की सरकार संसद में अल्पमत में है। लोकसभा में वह समय-समय पर बहुमत का जुगाड़ कर लेती है, पर राज्यसभा में स्पष्ट रूप से अल्पमत में है। यही कारण है कि सरकार अपने बूते कोई कानून संसद से पारित नहीं करवा सकती।
लगता है कि परमाणु सुरक्षा दायित्व कानून अपने हिसाब से बनाने में विफल सरकार ने खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश की इजाजत देने का कोई वादा अमेरिका को दे रखा है और इसी वादे को निभाने के लिए उसने यह निर्णय जल्दबाजी में कर डाला। अब कारण जानबूझ कर विपक्ष से टकराव लेना रहा हो या अमेरिकी राष्ट्रपति से किया गया कोई वादा, खुदरा व्यापार में विदेशी कंपनियों को निवेश की इजाजत देने का एक ही परिणाम होना है और वह है बहुसंख्यक लोगों को बेरोजगार बना देना।
देश की एक बहुत बड़ी आबादी असंगठित क्षेत्र में खुदरा दुकान खोल कर अपनी आजीविका का प्रबंध करती है। खुदरा क्षेत्र खेती के बाद देश में रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है। खेती से जुड़े लोग भी इस तरह के व्यापार में लगे हुए हैं। इससे जुडेÞ लोग उद्यमी नहीं, बल्कि मजदूर तबके के ही कहे जा सकते हैं। एक-एक दुकान में परिवार के सारे लोग लगे होते हैं और किसी तरह अपनी आजीविका चलाते हैं।
लेकिन केंद्र सरकार को यह मंजूर ही नहीं कि ये लोग अपनी मजदूरी पर आधारित स्वरोजगार पर आश्रित हों, इसलिए विदेशी कंपनियों के लिए दरवाजा खोला जा रहा है। जिन देशोें की कंपनियां भारत में खुदरा दुकानें खोलने आ रही हैं उन देशों ने अपने प्रकार की बंदिशें लगा कर भारत और अन्य विकासशील देशों के लोगों को अपने यहां आने पर बहुत सारे नियंत्रण लगा दिए हैं। वे देश तरह-तरह के अवरोध खड़े करके विदेशी प्रतिस्पर्धा से अपने बाजारों को बचा रहे हैं। ओबामा ने खुद अनेक ऐसे निर्णय लिए हैं जिनसे भारत का आईटी उद्योग प्रभावित हो रहा है। अपने देश में रोजगार बचाने के लिए अमेरिका और अन्य विकसित देश हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। उससे संबंधित नीतियां तैयार कर रहे हैं। उन नीतियों से भारत जैसे देशों का नुकसान हो रहा है, साथ ही विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा को भी।
पर हमारे देश की सरकार उस सेक्टर को विदेशी कंपनियों के लिए खोल रही है, जो असंगठित क्षेत्र में कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार लोगों को उपलब्ध कराता है और जिसमें विदेशी निवेश की कोई जरूरत नहीं है। भारत के खुदरा व्यापार में पहले से ही सब कुछ ठीकठाक चल रहा है। न तो इसके लिए किसी प्रकार के विदेशी वित्तीय निवेश की जरूरत है और न ही किसी प्रकार की टेक्नोलॉजी के निवेश की। इसके बावजूद अगर सरकार इसके लिए उतावली हो रही है, तो उसे बताना चाहिए कि आखिर उसका इरादा क्या है।
केंद्र सरकार कह रही है कि खुदरा व्यापार में विदेशी कंपनियों के आने से उपभोक्ताओं को फायदा होगा; कम कीमत पर उनको सामान मिलेंगे। यानी सरकार कह रही है कि इससे महंगाई कम होगी। इस तरह का विचार तथ्यों से परे है। खुदरा व्यापार में देश के बड़े औद्योगिक घराने पहले से ही सक्रिय हैं। कुछ साल पहले जब सरकार ने बड़े औद्योगिक और व्यापारिक घरानों को खुदरा व्यापार में आने की इजाजत दी थी, तो हमने इसका विरोध किया था।
सरकार उस समय भी यही कह रही थी कि बड़े औद्योेगिक घरानों के खुदरा व्यापार में आने से बाजार में कीमतें कम होंगी। हम सब जानते हैं कि सरकार का वह दावा गलत साबित हुआ है। सच तो यह है कि बड़े घरानोें के खुदरा बाजार में आने के बाद हमारे देश में कीमतें और भी बढ़ी हैं। सच कहा जाए तो कीमतों का तेजी से बढ़ना उसी समय से शुरू हुआ है, जब से कॉरपोरेट घरानों को खुदरा व्यापार में आने की इजाजत दी गई। सब्जियों के दाम भी उसके बाद से ही तेजी से बढ़ने शुरू हुए। भारत का कॉरपोरेट क्षेत्र असंगठित खुदरा कारोबारियों से कम लागत पर काम नहीं कर सकता। फिर वह सस्ती कीमत पर उपभोक्ता वस्तुओं को कैसे बेच सकता है? ज्यादा से ज्यादा वह कुछ समय के लिए कीमतें कम कर सकता है। अपनी ज्यादा पूंजी की ताकत से वह ज्यादा दिनों तक घाटा सह कर काम कर सकता है और इस बीच असंगठित क्षेत्र के अपने प्रतिस्पर्धियों की दुकानें बंद करवा सकता है। लेकिन उसके बाद वह उपभोक्ताओं को दुहना शुरू कर देता है।
यही हमारेदेश में भी हुआ। कॉरपोरेट सेक्टर की अनेक खुदरा दुकानें खुलीं और कुछ समय के लिए उन दुकानों ने कुछ चीजों की कीमतें कम रखीं। कुछ दुकानोें को

बंद करवाया और फिर कीमतें बढ़ा दीं। कॉरपोरेट सेक्टर के पास देश का पूरा बैंकिंग सेक्टर उपलब्ध है और वह वहां से पैसा लेकर   ज्यादा से ज्यादा दिनों तक घाटे में भी अपना व्यापार चला सकता है। अगर उसका व्यापार ठप भी हुआ तो असली नुकसान बैंकों का होगा और अगर अपने प्रतिद्वंद्वियों को समाप्त कर बाजार में प्रतिद्वंद्विता खत्म करने में वे सफल हो गए तो फिर उपभोक्ताओं को चूसना शुरू कर देंगे।
बडेÞ कॉरपोरेट घरानों के खुदरा व्यापार में आने से उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिली। उलटे बढ़ती महंगाई के कारण वे लगातार आहत हो रहे हैं। इसलिए केंद्र सरकार द्वारा यह प्रचारित करना कि विदेशी पूंजी को खुदरा क्षेत्र में लाकर महंगाई कम की जा सकती है, लोगों को गुमराह करने वाला प्रचार है।
हम जानते हैं कि उपभोक्ता कोई अलग जीव नहीं है। हम सभी उपभोक्ता हैं। जो उत्पादक हैं वे भी उपभोक्ता हैं। जो वितरक हैं, वे भी उपभोक्ता हैं। जो खुदरा दुकान चलाते हैं और जो उन पर आश्रित हैं वे भी उपभोक्ता हैं। ऐसे लोगों की संख्या देश की आबादी की बीस फीसद से ज्यादा होगी। कुछ साल पहले देश में चार करोड़ खुदरा दुकानें होने का अनुमान लगाया गया था। अगर एक दुकान पर पांच लोगों के अपने जीवनयापन के लिए निर्भर होने की बात मान लें तो उस समय बीस करोड़ लोग खुदरा व्यापार पर आश्रित थे। तब देश की आबादी सौ करोड़ मानी जाती थी। आबादी बढ़ने के साथ खुदरा व्यापार पर आश्रित लोगों की तादाद भी बढ़ गई होगी।
केंद्र सरकार कह रही है कि विदेशी कंपनियों के खुदरा व्यापार में आने के बाद एक करोड़ लोगों को उनमें रोजगार मिलेगा। सरकार यह आंकड़ा बढ़ा-चढ़ा कर बता रही है। पर अगर इसे सच मान भी लिया जाए तो  सवाल यह उठता है कि कॉरपोरेट विदेशी खुदरा दुकानों में एक करोड़ लोगों को नौकरी कितने करोड़ लोगों को बेरोजगार बना कर मिलेगी? सरकार इसका आंकड़ा क्यों नहीं पेश करती है?
सरकार कह रही है कि किसानों को विदेशी कंपनियों से बहुत फायदा होगा। उन्हें अपनी उपज पर बेहतर आमदनी होगी। लेकिन क्या यह सच है? भारत में गन्ना किसानों की हालत देख कर हम कह सकते हैं कि जब बड़े उद्योगपति किसानों के माल के खरीदार बनते हैं, तो किसानों को किस तरह का फायदा मिलता है! जब किसानों के अपनी फसल बेचने के लिए आर्थिक रूप से बहुत मजबूत और संगठित खरीदार ही रह जाएंगे तो फिर उनकी मोलभाव करने की ताकत भी घट जाएगी। किसान उनके सामने अपने आपको असहाय समझेंगे। ये विदेशी कंपनियां अपने हिसाब से किसानों को उत्पादन करने के लिए भी मजबूर करने लगेंगी।
जब भारत में अंग्रेजों का शासन था, तो नील की खेती किसान करते थे। नील के खरीदार शक्तिशाली उद्योगपति ही हुआ करते थे। किसानों की हालत तब कैसी थी, हम सब जानते हैं। निलहे साहबों के सामने उस समय की सरकार की नीतियों के तहत किसानों की हालत गुलामों से भी बदतर थी। उस समय नील खरीद कर वे उद्योगपति कपड़े रंगने और अन्य औद्योगिक कामों में इस्तेमाल किया करते थे। बदले संदर्भ में किसानों की हालत ब्रिटिशकालीन निलहा युग के समान हो जाएगी।
हम जानते हैं कि गांधीजी ने भारत में पहला आंदोलन निलहों के खिलाफ ही किया था। गांधीजी के नाम की कसम खाने वाली कांग्रेस आज फिर उसी निलहा युग को वापस लाना चाहती है। इसलिए उसने विदेशी कंपनियों को दुकान खोलने की इजाजत देने का फैसला किया है। वह उपभोक्ताओं की तरह किसानों को भी सब्जबाग दिखा रही है।
वालमार्ट कंपनी की दुकान खोलने वाली जगहों का अध्ययन करने के बाद एक एजेंसी ने पाया कि कुछ समय के लिए तो चीजें सस्ती हो गर्इं और उपभोक्ताओं को फायदा भी हुआ, लेकिन बाद में वहां उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें सामान्य से सत्रह फीसद ज्यादा हो गर्इं। यानी वालमार्ट जैसी कंपनियां पहले कीमत कम करके अपने प्रतिद्वंद्वी को समाप्त करती हैं, फिर एकाधिकार प्राप्त करने के बाद कीमतें बढ़ा देती हैं। यह एक ऐसा तथ्य है जिससे हम सभी परिचित हैं। फिर भी कहा जा रहा है कि इन विदेशी कंपनियों के आने से उपभोक्ताओं को फायदा होगा? सवाल उठता है कि कितने दिनों या कितने महीने फायदा होगा? एक समय तो आएगा ही जब ये कंपनियां उपभोक्ताओं को दुहेंंगी और किसानों का भी शोषण करेंगी।
छोटे उद्योगों को फायदा पहुंचाने का भी डंका सरकार पीट रही है। कह रही है कि इन कंपनियों को अपना माल छोटे और मझोले उद्योेगों से कम से कम तीस फीसद खरीदना होगा। कोई सरकार से पूछे कि अगर वह चाहे तो यह निर्णय बदलने में कम से कम और ज्यादा से ज्यादा कितना समय लगाएगी। एक बार विदेशी कंपनियां हमारे देश में आ गर्इं तो फिर वे सरकार पर दबाव डाल कर उन सारी बंदिशों को हटवा लेंगी जिनसे उनका व्यापार बाधित होता हो या मुनाफा कम होता हो। वे स्थानीय प्रशासन को भ्रष्ट बना कर असंगठित क्षेत्र के अपने प्रतिस्पर्धियों की दुकानें बंद करवाने के लिए कुछ भी कर सकती हैं। जाहिर है इसके कारण भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलेगा।
हमारे प्रधानमंत्री अर्थशास्त्री हैं। वे जानते हैं कि विदेशी कंपनियां खुदरा व्यापार के क्षेत्र में भारत आकर क्या-क्या गुल खिला सकती हैं। इसके बावजूद वे इस तरह का निर्णय ले रहे हैं। सवाल उठता है कि एक अर्थशास्त्री होकर वे इस तरह का अनर्थ क्यों कर रहे हैं।

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